शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

द वैदिक टाइम्स पिकहाउस

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द वैदिक टाइम्स फरवरी अंक 2014

       

भक्तामर स्तोत्र –चित्र,विडियो और चमत्कारी श्लोक 

“भक्तामर स्तोत्र” भक्ति प्रधान स्तोत्र है, जैन काव्य परंपरा में इस स्तोत्र की अपनी महती महिमा और गरिमा हैं, स्वतंत्र पहचान है|भक्तामर स्त्रोत्र-संस्कृत के रचयिता मानतुगं आचार्य हैं। 
 मातुंगाचार्य
भक्तामर स्तोत्र का महत्व
समाधि स्थल मातुंगाचार्य भोजपुर 
अवंति के राजा हर्ष के दरबार में, मयूर तथा बाण नाम के दो महान विद्वान पंड़ितों नें राजा को अपनी-अपनी विद्वता के अनुरूप चमत्कारों के जरिए प्रभावित किया था। मयूर पंड़ित नें अपनी लड़की के शाप से हुये कोढ़ (कुष्ट) रोग के निवारण के लिए सूर्य-देवता की स्तुति की और छठ्ठे श्‍लोक की रचना करते वक्त सूर्य-देव ने प्रकट होकर वरदान दिया जिससे कुष्ट-रोग दूर हो गया। अपने ही ससुर मयूर पंड़ित का चमत्कार, पंड़ित बाण के लिए स्पर्धा का विषय बना। राजा के पास बाण पंड़ित नें प्रतिज्ञा की कि मैं चंड़िका-देवी की उपासना कर चमत्कार करूंगा। बाण पंड़ित नें अपने दोनो हाथ एवं पैर कटवा दिए एवं स्तोत्र के प्रभाव से हाथ व पैर जैसे थे वैसे ही हो गए। राजा इस चमत्कार से अति-प्रसन्न हुए| उसके बाद राजा के दरबार में सभी लोग दोनों पंडितो और उनके धर्म को पूजने लगे| एक बार दरबार में दूसरे धर्मो की चर्चा हो रही थी और कहा जा रहा था की बाकी सारे धर्म निरर्थक है| तब कितने ही पंड़ितों ने राजा से कहा कि जैनों के अन्दर ऐसे मंत्रो का अद्वितीय-प्रभाव नहीं हैं। तभी राजा के प्रधान ने राजा से कहा कि जैनाचार्य पू. मानतुंग सुरीश्वरजी इस समय हमारे राज्य में विराजित हैं और वह बड़े ही विद्वान साधु हैं|
यह सुनकर राजा ने पू. मानतुंग सुरीश्वरजी को बुलावा भेज कर कहा कि आप भी आप के भगवान व जैन-धर्म का चमत्कार दिखाइए| पूज्य आचार्य मानतुंग सुरीश्वरजी महाराज ने कहा कि जैन साधु मोक्ष प्राप्ति की इच्छा रखते हैं और वे किसी भी जीव को यन्त्र/तंत्र से दुःख नहीं पहुचाते| फिर भी अगर राजा जोर देते हैं वह उसे भक्ति की शक्ति दिखा सकते हैं| ऐसा कह कर आचार्यश्रीने स्वयं को 44 बेड़ीयों से बंधवा कर एक कालकोठरी में भारी तालो के साथ बंद करवा दिया तथा “भक्तामर” नाम के नूतन-काव्य की रचना की। वे एक-एक श्लोक बोलते गये और श्लोक के आश्चर्यजनक प्रभाव से एक-एक कर 44 बेड़ीयॉं स्वतः ही टूटती गई और कालकोठरी के ताले भी स्वतः टूट गए|
यह घटना को देख के राजा आश्चर्य चकित रह गए और जैन धर्म से प्रभावित होके पू. मानतुंग सुरीश्वरजी और भगवान श्री आदिनाथ के परम भक्त बने|
प्रस्तुत भक्तामर स्तोत्र की रचना “वसंततिलका छंद” में की गयी हैं| इस स्तोत्र की महिमा वक्त के साथ बढ़ती ही गयी|
सर्व सामान्य धारणा के अनुसार भक्तामर के कुछ प्रमुख श्लोक विशिष्ट प्रयोजनों में बड़े चमत्कारी सिद्ध होते हैं जैसे :-

वसंततिलकावृत्तम्।

सर्व विघ्न उपद्रवनाशक भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा-मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम् ।सम्यक्प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादा-वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम् ॥1॥

मंगलवार, 26 मार्च 2013

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हमें अपने बुजुर्गों को वृद्धाश्रम जाने से रोकना होगा


                   हमें अपने बुजुर्गों को वृद्धाश्रम जाने से रोकना होगा


by Jai Parkash (नोट्स) on 16 मार्च 2013 को 06:42 अपराह्न बजे
रोटी, कपड़ा और मकान के
अलावा हमें अपने रिश्तों
का मूल्य समझना होगा।
पितृ-दोष पूजा के बजाए,
हमें जीते जागते अपने बुजुर्गॉ
की पूजा करनी होगी।
अपने प्यार व  सेवा-भाव से
प्रसन्न कर  वृद्धाश्रम जाने से
रोकना होगा।  
मानवता की असली पहचान उसका दूसरों के साथ प्रेम, सद्भावना व आत्मीयता से व्यवहार करना है। परन्तु जब बुजुर्गों के मामले में हम अपने इस व्यवहार को क्यों भूल जाते हैं? जो माता-पिता हमें अच्छी शिक्षा दिलाते हैं। प्रत्येक सुविधा-साधन उपलब्ध कराने की कोशिश  हैं।  हमें आत्मनिर्भर बनना सिखाते हैं। वे अपना पूरा जीवन हमें सफल बनाने और हमारे पालन- पोषण में समर्पित कर देते हैं और जब दायित्व निभाने की हमारी बारी आती है तो हम मुंह मोड़ लेते हैं। आज उनकी पाबंदियां, रोक-टोक, सलाह-मशविरा बुरे लगते हैं। अपने जीवन के अनुभव से सही मार्गदर्शन या सलाह देते हैं तो हमें अखरता है। जब बेचारे शारीरिक रूप से कार्य करने मे. लाचार हो जाते हैं तो हम उन्हें अपना कम खुद करो या हमारे साथ रहना है तो  जैसे हम रखें वैसे ही रहो। जिससे जिनको हम अपना बुजुर्ग कहते या मानते हैं, अंदर से भी टूट  जाते हैं और हारकर वृद्धाश्रम का रास्ता खोज लेते हैं। जिन्होंने खुशहाल-समृद्ध परिवार का  सपना संजोया था, अकेले  वृद्धाश्रम की मृत दीवारों को देख-देख कर घुटकर अपना शेष जीवन व्यतीत करते हैं। यही हैं रिश्ते, प्यार और मानवता। ऐसा क्यों? हम क्यों भूल जाते हैं की जैसा  हम बोयेंगे वैसा ही काटेंगे। आज हम अपने बुजुर्गों के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार कर रहें हैं,  हमारी भावी पीढ़ी न जाने हमारे साथ कैसा व्यवहार करेगी। नहीं, हमें अपनी सोच में बदलाव लाना होगा। रोटी, कपड़ा और मकान के अलावा हमें अपने रिश्तों का मूल्य समझना होगा। पितृ-दोष पूजा के बजाए, हमें जीते जागते अपने बुजुर्गॉ की पूजा करनी होगी। अपने प्यार व  सेवा-भाव से प्रसन्न कर  वृद्धाश्रम जाने से रोकना होगा।

भाग्य निर्माण में चन्द्रमा का अहम रोल


भाग्य निर्माण में चन्द्रमा का अहम रोल

by Jai Parkash (नोट्स) on 25 मार्च 2013 को 08:57 पूर्वाह्न बजे
 ''मन चंगा तो,
कठोती में गंगा''
भारतीय ज्योतिष में चन्द्रमा मन का कारक ग्रह है। मन में विचार उत्पन्न होते हैं और मन के विचार ही उसके भाग्य का निर्माण करने में सहायक होते हैं। शुभ (अच्छे) विचार व्यक्ति को समृद्धि और सफलता की ओर, जबकि अशुभ (बुरे) विचार अवनति की ओर  ले जाते हैं। किसी ने ठीक ही कहा है,'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत'। 
चन्द्रमा का बुद्धि, विवेक, कल्पनाशक्ति और वाणी पर अधिकार होता है।  शुक्ल पक्ष या स्वराशी का  शुभ चन्द्रमा आशावादी (सकारात्मक सोच) बनता है। जबकि क्षीण या अशुभ चन्द्रमा निराशावादी (नकारात्मक सोच) का निर्माण करता है जिससे क्रोध, भय, ईर्ष्या, द्वेष, निराशा व अनिद्रा आदि विषयों का जन्म होता है। क्रोध, भय तथा चिंताग्रस्त मन:स्थिति में विवेक का अभाव होने से उचित निर्णय नहीं लिया जा सकता। स्वामी शिवानन्द के अनुसार, ''क्रोध मानसिक दुर्बलता की निशानी है, इसका प्रारम्भ मूर्खता से तथा अंत पश्चाताप से होता है। '' वैसे ही जब क्रोध अपनी चरम सीमा पर होता है तो मधुर रिश्तों में भी कड़वाहट घोल देता है।  चाहे वह सम्बंध पति-पत्नी का हो, पिता-पुत्र का या चाहे साझेदार का हो। ऐसे व्यक्ति मन की निराशा और चिंता को भाग्य के भरोसे छोड, सोचने लगते हैं की हमारा जीवन ही कष्ट भोगने के लिए है। 
मानस रोग एक ऐसा रोग है, जो व्यक्ति को अंदर से खोखला क्र देता है। जब चन्द्र ग्रह किसी अशुभ भाव या किसी अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो बुद्धि भ्रमित्त हो जाती है, मन की एकाग्रता भंग हो जाती है, वाणी में कड़वाहट तथा शक्ति क्रोध में परवर्तित हो जाती है। जिन लोगों का चन्द्रमा निर्बल होता है उन्हें क्रोध बहुत आता  है, मन बैचन रहता है। अत: मन पर नियन्त्रण रखने या जिनका चन्द्र ग्रह की निर्बल है, उन्हें निम्न उपाय करने से काफी लाभ प्राप्त हो सकता है। 
० अमावस्या को पितरों के नाम गायत्री मन्त्र का जप करना चाहिए।
० पानी में दूध डालकर स्नान करना चाहिए।
० आग्नेय कोण में शयन नहीं करना चाहिए। 
० दूध में काले तिल डालकर शिवलिंग स्नान कराएँ।
० शुक्लपक्ष के सोमवार से ' ॐ जूं स:' मन्त्र का शिवालय या शिवमूर्ति के समक्ष जाप करना चाहिए। 
                                                                                       
                                                           --जय प्रकाश भारद्वाज द्वारा वैदिक टाइम्स पौष-माघ २०१३ में प्रकाशित